हिन्दुओं का प्रमुख पर्व मकर संक्रान्ति पौष मास में सूर्य के मकर राशि पर आने पर मनाया जाता है। इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। यह त्योहार जनवरी माह के 14वें या 15वें दिन ही पड़ता है । शास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रान्ति का दिन सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। मकर संक्रान्ति पूरे भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता।तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि असम में बिहु, हरियाणा, पंजाब में माघी और यूपी, बिहार में इसे खिचड़ी कहते हैं। कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। विभिन्न प्रान्तों में इस त्योहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं।

मकर संक्रांति को सवेरे हलवा-पुरी या खीर बनाते हैं और खिचड़ी, रेवड़ी, रुपए (मूंग की दाल, चावल मिलाकर) मिनश कर ब्राह्मण को देते हैं। साथ में सामर्थ्य होने पर कोई भी 14 चीजें मिनश कर गरीबों को बांट देते हैं। संकरात के 360 प्रकार के नेग होते हैं। जिन लड़कियों की शादी इसी वर्ष हुई होती है, उस लड़की से जो भी नियम कराया जाता है, दूसरे वर्ष उस लड़की से उद्यापन करवाकर उसके मायके से ससुराल में विशेष बायना भी भेजा जाता है। इसमें मावे अर्थात खोए के 365 पेड़े या लड्डू और चांदी का दिया-बत्ती व चिडिंया चिरौटे, तुलसी का पौधा, दो सतिए (स्वस्तिक ) भेजते हैं। ये सब चांदी की चीजें प्रतीक हैं। जैसे चिड़िया चिरौते दाना डालने और तुलसी का पौधा जल डालने के प्रतीक रूप में होते हैं। सामर्थ्य होने पर पूरे परिवार के लिए कपड़े भी भेजे जाते हैं। संक्रांति पर लड़कियों के यहां सामर्थ्य के अनुसार प्रति वर्ष लड़की, दामाद व बच्चों के गर्म-ठंड के वस्त्र, फल, मिठाई, गज्जक व रेवड़ी और दमाद के टीके का लिफाफा, लड़की व बच्चों के रुपए भेजे जाते हैं। बहुएं ससुर जी को जगाने और कपड़े पहनाने व गुड़ की भेली, फल, रुपए देवें व ओढ़ने-बिछाने के कपड़े देवें। सास को सीढ़ी चढ़ाने-उतारने तथा ननद-नंदोई, जेठ-जेठानी को वस्त्र देवें। देवर को बादाम से मनाने आदि कार्य भी संक्रांति के दिन करते हैं। आज के दिन से 1 वर्ष तक चिड़ियों को एक मुट्ठी बाजरा डालना, जमादारनी को एक टोकरा व झाड़ू देकर 1 वर्ष तक घर के बाहर झाड़ू लगवाना और अगली संक्रांति पर साड़ी, ब्लाउज और रुपए देना, घर के दरवाजे के बाहर को दिया जलाना अथवा एक माह तक एक थाल प्रतिदिन ब्राह्मण को दान देना आदि नियम भी कुछ महिलाएं धारण करती हैं। बहुत से लोग खुद या ब्राह्मणियों से महीने की हर १४ तारीख को भजन कराते हैं और दूसरी संक्रांति पर सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, तिल वाला मीठा आदि दक्षिणा देते हैं।

राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएँ अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएँ किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। इस प्रकार मकर संक्रान्ति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है। महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएँ अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गूल नामक हलवे के बाँटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं -“लिळ गूळ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला” अर्थात तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो। इस दिन महिलाएँ आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी लगाती हैं।

इस दिन पश्चिम बंगाल के गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। कहा जाता है-“सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार।” ऐसा विश्वास है कि १४ जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरुआत होती है। हमारे त्यौहार रूढ़िवादी न होकर विज्ञान पर आधारित है, इन्हें मनाने के पीछे सार्थक कारण छुपे हुए हैं।

स्नेहलता मनमोहन गुप्ता