Blog

पौराणिक ही नहीं व्यावहारिक रूप से है महत्वपूर्ण है बांसुरी 01 Oct

पौराणिक ही नहीं व्यावहारिक रूप से है महत्वपूर्ण है बांसुरी

बांसुरी का नाम लेते ही भगवान श्रीकृष्ण की जीवंत छवि हमारे मन-मष्तिष्क में अंकित हो जाती है। भगवान श्रीकृष्ण वह छवि जो कभी बांसुरी बजाकर अपने बालसाखाओं को भाव विभोर करते थे, तो कभी अपनी गायों के साथ समस्त पशु –प्राणियों तथा चर-अचर को मंत्र मुग्ध कर लेते थे। कृष्ण की बांसुरी का ही आकर्षण था कि इसकी तान सुनकर सारी गोपियाँ अपनी सुध-बुध खोकर कृष्ण की दीवानी बनकर प्रेम में मग्न हो जाती थी। भगवान श्रीकृष्ण बांसुरी बजाकर सब गोपियों के मन को हर लेते थे। श्रीकृष्ण और वंशी की इतनी अभिन्नता है कि कृष्ण के नाम के पहले वंशी का नाम जुड़ा है। जहां वंशी है वहां वंशीधर हैं, जहां मुरली है वहां मुरलीमनोहर, मुरलीधर हैं, जहां वेणु है वहां वेणुगोपाल हैं। यह वंशी उनकी संगिनी है, सहचरी है। वे इससे एक क्षण भी विलग नहीं होते हैं।
श्रीकृष्ण की वंशी का मधुर निनाद ही नादावतार था। इसी वंशी ध्वनि ने ब्रज में जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कर दिया। इस वंशी-ध्वनि ने न केवल मनुष्यों को, अपितु ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी प्रभावित किया।
गोपियों को मुरली से सौतिया डाह उत्पन्न हो गया है। वे मुरली की तानाशाही से दुखी हैं। यह मुरली कृष्ण के अधरों की शय्या पर लेटकर हमारे श्यामसुंदर से अपने पैर पलोटवाती है। गोपियां कहती हैं–
अब कान्ह भये बस बाँसुरिके, अब कौन सखि! हमकों चहिहैं।
वह रात दिना सँग लागी रहै, यह सौत को शासन को सहिहै।।

गोपियां कहती हैं–यह मुरली बहुत ठगनी है, पर एक उपाय है, ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी–
‘करिये उपाय बाँस डारिए कटाय, नाही उपजैगो बाँस नाहि बाजेगी बासुँरी।’

तब मुरली ने भी कहा–गोपियो! तुम हमारी तपस्या को नहीं समझती। मैंने तप, बलिदान, समर्पण, हृदय की शून्यता सब कुछ सहा है। मैं कठोर कुठार से काटी गयी, आरी से छाँटी गयी, एक नहीं सात-आठ छिद्र किये गये। मैं एक पोली बांस हूँ, अन्दर कोई भी गांठ नहीं है। मेरे से जो राग रागिनी का मधुर स्वर निकलता है, वह सब भगवान के मुख से स्फुरित होकर निकलता है। उनकी प्रेरणा के बिना मैं शुष्क बांस की जड़ नली हूँ। मैं पूर्णत: अहंशून्य हूँ इसीलिए श्रीकृष्ण का मुझपर अभेद प्रेम है।यह था वेणु का समर्पण। मुरली से हमें यही शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को अंहकार छोड़कर श्रीकृष्ण के चरणों की शरणागति लेनी चाहिए।

तप हम बहुत भाँति करयो।
हेम बरिखा सही सिर पर घाम तनहिं जरयो।।

काटि बेधी सप्त सुरसों हियो छूछो करयो।
तुमहि बेगि बुलायबे को लाल अधरन धरयो।।

इतने तप मैं किये तबही लाल गिरधर बरयो।
सूर श्रीगोपाल सेवत सकल कारज सरयो।।

सनातन धर्म में बांसुरी आस्था का प्रतीक है। बांसुरी सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं है बल्कि ये ऐसी चीज़ है जो आपके बिगड़े काम भी बना सकती है। घर में अलग-अलग रंग की बांसुरी रखने से घर का वास्तु ठीक रहता है और मनोकामना पूर्ण होती है। धार्मिक मान्यता है कि अगर विवाह में परेशानी आ रही है तो बिस्तर के पास लाल रंग की बासुरी रखने से मनचाहा जीवन साथी मिलता है। अगर व्यापर में घाटा हो रहा है तो प्रतिष्ठान में काले रंग की बांसुरी रखने से बिगड़े काम भी बन जाते है। वैज्ञानिक एवं चिकित्सीय दृष्टि से देखे तो बांसुरी हमारे स्वास्थ के लिए लाभकारी होती है।
बांसुरी मधुर सुर के साथ हमारे आरोग्य को बढ़ाती है। जिन्हें श्वास रोग है, फेफड़े कमजोर है ,बांसुरी बजाने के नियमित अभ्यास से इस कष्ट से निजात पाया जा सकता है। फेफड़ों की कार्यशक्ति बढती है। इसके लगातार अभ्यास से रक्त का संचार सुचारू एंव शुद्ध रूप से होता है। शरीर को अधिक मात्रा में आक्सीज़न मिलती है। इस तरह शरीर स्वस्थ रहता है। बांसुरी बजाने से हमें तन और मन की शुद्धि मिलती है। इस तरह हम तन-मन से स्वस्थ रहते हैं।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *